शनिवार, 27 फ़रवरी 2016



                                                 साहित्यिक संस्था प्रवाह की काव्यगोष्ठी सेन्ट्रल वार ऐशोसियशन कचहरी के सभागार में संपन्न हुई ।
                                                 सेन्ट्रल वार के पूर्व अध्यक्ष ब्रजेश निश्र द्वारा सरस्वती वंदना से प्रारम्भ हुई काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश  अडिग सामाजिक कृत्रिमता  को निशाना बनाया ---
                                                 सबने तो मुझसे यही कहा
                                                 तुम भी इसको स्वीकार करो 
                                                अंदर से चाहे घृणा करो
                                                 ऊपर से लेकिन प्यार करो
                                                अपने कन्नौजी लोकगीतों के लिए मशहूर कवि विजय ठाकुर ने पारिवारिक  विघटन का दर्द प्रकट किया --------
                                         
                                                जोड़ता मैं रहा मेरा घर बाट  गया
                                                पहले सीना बटा फिर जिगर बाट गया
                                               विलुप्त होती ख्यालगायकी के एकलौते स्तम्भ लल्लन बाबू ने वर्त्तमान समय में जिन्दा रहने को भी संघर्ष बताया -----------
                                               इससे बढ़ कर और क्या होगी कमले जिंदगी
                                               जिंदगी भर हल न कर पाये सवाल जिंदगी
                                               खिज्र की भी उम्र मिल जाती तो क्या करते जनाब
                                               चार दिन ही हो गए हैं जब बबाल जिंदगी
                                            प्रसिद्द गीतकार कमल मानव ने सौंदर्य के विभिन्न आयामों की व्याख्या की --------                                      
                                             इसका न कभी भी क्षय होता
                                             यह तो अमृत की प्याली है
                                             सुंदरता अक्षय सुंदरता
                                            मणिदीपों की दिवाली है
                                     आक्रोश के कवि सुशील दीक्षित विचित्र ने सामाजिक विद्रूपता पर व्यंग किया ------
                                            अव्यवस्था का कुम्भकर्ण
                                            हम सब के सर पर सो रहा है
                                            कामधेनु का बछड़ा
                                            सौ ग्राम दूध को रो रहा है
                                    वीर रास के कवि हरिओम शुक्ल ओमी ने पाकिस्तान को चुनौती देते हुए कहा -------
                                         हो चूका है समझौते वालो नीतियों का अंत
                                         सत्ता में       
                                                    

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

किसी  भी सभ्यता  के सर्वांगीण विकास के लिए  उस समाज का शिक्षित होना  अनिवार्य शर्त है । यह तथ्य सनातन सभ्यता के संवाहक ऋषि मुनि बेहतर समझते थे  इसलिए उन्होंने सनातन सभ्यता के उदय काल से ही

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

शाहजहाँपुर ।  साहित्यिक संस्था प्रवाह की गोष्ठी भुवनेश्वर शोध संस्थान के महासचिव  डॉ0  राजकुमार शर्मा के अब्दुल्लागंज  स्थित निवास  संपन्न हुई ।  गोष्ठी  का शुभारम्भ दीपक कंदर्प द्वारा माँ  वीणापाणी  की वंदना से किया गया ।
                                          गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए हुए वरिष्ठ कवि दादा  ओमप्रकाश अडिग गीत सृजन की भावभूमि  पर प्रकाश डाला---------
                                                  जितना चलूँ शब्द में उतना मैं ही खो जाऊं ,
                                                   कभी कभी तो पूर्ण स्वयं में में कविता  जाऊं।   
                                          प्रसिद्द गीतकार कृष्णधार मिश्र  ने  सृष्टि विखंडन  कवि  दुःख प्रकट किया -----
                                                   आदि अनुष्टुप का दुख मेरे
                                                   गीत अगर दोहराते हैं ,
                                                   तो क्या हुआ क्रौंच बेचारे
                                                   अब मारे जाते हैं   

सोमवार, 25 जनवरी 2016

 अभी दो दिन पहले आदरणीय कवि  अशोक चक्रधर ने कहा की वे कविता का स्कूल खोलेंगे । दरअसल कविता स्कूल में सीखने वाला ज्ञान नहीं है बल्कि सानिध्य अध्ययन और फिर चिंतन की विषयवस्तु है। कबीर तो घोषणा करते हैं की मसि कागज़ छुओ नहीं ,कलम गहि नहीं हाथ । अंधे सूर को  अकादमिक ज्ञान कहाँ उपलब्ध था लेकिन आज इन्हीं के एक एक दोहे और पद पर सैकड़ों लोगों ने डाक्टरेट हासिल की । आज जरूरत स्कूल की नहीं बल्कि उन युवकों को खोजने की है जिन के अंदर कविता के अंकुर फूटने के बाद बिना खाद पानी के मुर्झाने लगे हैं । उन्हें प्रकाश में लाने की जरूरत है । प्रोत्साहित करने की जरूरत है । मंच देने की जरूरत है । प्रवाह संस्था पिछले १६ सालों से यही कर रही है । उसका उद्देश्य ही नए कवियों को बढ़ावा देना और उनकी शैली को और प्रभावशाली बनाना है । उसने कई ऐसे बेजोड़ कवियों को सुधी  समाज से परिचित कराया जिन्होंने कालजयी रचनाये लिखी हैं । इसके लिए प्रवाह ने दो तरीके अपनाये । पहला यह की महीने में एक गोष्ठी अवश्य होगी और दूसरा यह की हर गोष्ठी में एक नई  कविता अवश्य सुनानी होगी । संस्था को तत्कालीन नामचीन कवि डॉ गिरजानन्द आकुल , दादा राजबहादुर विकल का संरक्षण प्राप्त था । इसके चलते कई युवक नवोदित से थोड़ा बड़े हुए फिर अवसर पा कर स्थापित हो गए । इस बीच प्रवाह ने अपने प्रकाशन से अपने सदस्य कवियों का डॉ प्रशांत अग्निहोत्री व डॉ राजीव सिंह के सम्पादन में एक संकलन भी निकाला । प्रवाह में सबसे खास बात यह है की हर साल इसका अध्यक्ष और सचिव बदल जाता है  जिससे नए कवि को भी अध्यक्ष  या सचिव बनने का अवसर मिल जाता रहा । इससे भी नवोदित कवियों का उत्साह बढ़ता । सस्था किसी से चंदा नहीं लेती न सदस्यता शुल्क बस साल में (अब १८ सदस्य संख्या हो जाने पर डेढ़ साल में )एक बार गोष्ठी करनी होती है । हालांकि प्रारम्भ में प्रवाह में केवल बारह सदस्यों का चलन था। पिछले वर्ष इसे समाप्त कर दिया गया । 








ये अपने  भाई है महमूद
इनका अपना अलग बजूद
ये इनका छोटा  सा परिवार
करें सब एक दूजे से प्यार
छोटे करते हैं सम्मान
बड़े  देते हैं उनको  ज्ञान
वह वह भाई महमूद
मत खाना ज्यादा अमरुद 

शनिवार, 23 जनवरी 2016

नाजिम जी भारत में पैदा होने वाले सभी भारत के ही बेटे हैं । मेनन भी और दाऊद भी । यही की मिट्टी में लोट कर बड़े हुए और यहीं का अन्न खा कर पुष्ट हुए लेकिन इन्हीने भारत की पीठ पर चुरा मारा तो क्या इनकी आरती गाई जायेगी। भारतीय परम्परा हैं की मौत के बाद  उसकी बुराइयों को नहीं अच्छाइयों को याद किया जाता है  वही मोदी ने किया । इससे आप के आराध्य  वेमुला आतंकवादियों का समर्थन करने का पाप धूल नहीं जाता मियांजी । और भाईजी यह भी बताना जब मुस्लिमों का  ध्रुवीकरण किया जाता है तब आप को एतराज नहीं होता और जब हिन्दुओं का धुर्वीकरण होता है तब आप को बहुत तकलीफ होती है । वैसे कुरैशी भाई मालदा व पूर्णिया की घटनाओं के बारे में , वहां के जदयू मुस्लिम नेता द्वारा खड़े हो कर दंगा भड़काने के बारे में भी कुछ  कहिये ।  बताइये की इस पर आप के समूचे समर्थकों की चुप्पी के कौन सा गलापन है दोगला या तेगलापन  । भाजपा मजहब के नाम पर  देश नहीं तोड़ती मियाँ जी , कश्मीर को वर्ग विशेष की कत्लगाह नहीं बनाती । 

गुरुवार, 14 जनवरी 2016




                    विलुप्त होती गणित की एक महान पम्परा 
      संस्कृति ,अध्यात्म,दर्शन  और विभिन्न विषयक स्तरीय ज्ञान भारतीयों के रक्त का रंग रहा है । यहां से ज्ञान की दीप शिखाएं लेकर भारतीय मनीषी अरब के रास्ते होते हुए यूनान तक जा पहुँचे । वे जहाँ -जहाँ से गुजरे ज्ञान का प्रकाश फैलाते चले गये ।  आज  अनंत इकाइयों व दूरियों की गणना क्षणभर में हो जाती है ,तो इसका श्रेय  भारत को ही जाता है ,भारत के ही भास्कराचार्य प्रथम ने संख्या को दशमलव के रुप में हिंदू और अरबी शैली में लिखा था। भास्कराचार्य द्वितीय ने लीलावती ग्रन्थ लिखकर गणित के विभिन्न शाखाओं का सरलीकरण कर दिया । पाईथागोरस के नाम से प्रसिद्ध प्रमेय को उन्होंने  १२ वीं शताब्दी में लिखी अपनी पुस्तक लीलावती में सिद्ध कर दिया था ।
       भारत देश में गणित की पम्परा बहुत ही प्राचीन है और इसका उल्लेख शास्त्रों में भी मिलता है । याजुष ज्योतिषम में दिया हुआ है -
           यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
           तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्‌।।
 अर्थात् जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि सबसे ऊपर रहती हैउसी प्रकार वेदांग और शास्त्रों में गणित सर्वोच्च स्थान पर स्थित है। 
 भारतीय गणितग्यों  की अति महत्वशाली उपलब्धि  ‘शून्य’ का अविष्कार थी जिस के सहारे आज का विज्ञान आकाश की ऊचाईयों को छूने को तत्पर है। सर्व प्रथम शून्य अंक के प्रयोग का उल्लेख ईसा से 200 वर्ष पूर्व के धार्मिक ग्रँथों सें मिलता है। शून्य का अर्थ है – ‘कुछ नहीं’। पहले शून्य अंक एक बिन्दी के चिन्ह से दर्शाया जाता था। तदन्तर उस का आकार एक छोटे वृत की शक्ल का हो गया। इसी रूप में शून्य को अन्य अंकों की तरह से एक ‘अंक के तौर पर’ स्वीकार कर लिया गया।ईशवासोपनिषद  उपनिषद  में शून्य की सुन्दर परिभाषा इस प्रकार की गयी हैः-
                   ॐपूर्णमदपूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
        पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
  यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं हैअपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा हैजो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता हैयह भी पूर्ण हैवह भी पूर्ण हैपूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती हैतो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य  अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।
   भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा हैयह दुनिया भी मानने लगी है। यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक "कोडेक्स विजिलेन्सहै। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है कि "गणना के चिन्हों से (अंकों सेहमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्य देश गणना  ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता हैजिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"
    नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
        भारतीय अंकों की विश्व यात्रा की कथा विश्व के अनेक विद्वानों ने वर्णित की है। इनका संक्षिप्त उल्लेख पुरी के शंकराचार्य श्रीमत् भारती कृष्णतीर्थ जी ने अपनी गणित शास्त्र की अद्भुत पुस्तक "वैदिक मैथेमेटिक्सकी प्रस्तावना में किया है।वे लिखते हैं कि इस संदर्भ में यह कहते हर्ष होता है कि कुछ तथाकथित भारतीय विद्वानों के विपरीत आधुनिक गणित के मान्य विद्वान यथा प्रोजी.पीहाल्स्टैंडप्रोगिन्सबर्गप्रोडीमोर्गनप्रोहटनजो सत्य के अन्वेषक तथा प्रेमी हैंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया और प्राचीन भारत द्वारा गणितीय ज्ञान की प्रगति में दिए गए अप्रतिम योगदान की निष्कपट तथा मुक्त कंठ से भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
    अंकों के क्रमों का विवेचन हमको यजुर्वेद के 39 अध्याय के छठे श्लोक में देखने को मिलता है - 
        सविता प्रथमेऽहन्नग्नि र्द्वितीये वायुस्तृतीयऽआदिचतुर्थे चन्द्रमा:                                    पञ्चमऽऋतु:षष्ठे मरूतसप्तमे बृहस्पतिरष्टमे।                                                                 मित्रो नवमे वरुणो दशमंऽइन्द्र एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे। 
        भारत और गणित का रिश्ता 400 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व अर्थात स्वर्ण युग तक माना जाता है।भारत  के इतिहास मेंशून्य ही नही इसके अलावा भी कई उपलब्धियां विश्व के मानचित्र पर दर्ज़ कराईं हैं जैसे दशमलव प्रणाली,बीजगणित, उन्नत ट्रिग्नोमेट्री अर्थात त्रिकोणमिति आदि बहुत कुछ दिया है।
     वैदिक काल 400 से 1200 का शास्त्रीयकाल तथा वर्तमान काल में हमारे देश में कई महान गणितज्ञ हुए जैसे आर्यभट्ट(476 -550 ) इनके नाम से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो इन्होंने ही सिद्ध किया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है न कि सूरज ।इन्होंने ने ही वैज्ञानिक रूप से पहली बार चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण की अवधारणा को समझाया था।इन्होंने ही गणित के सिद्धांत को 332 श्लोकों के माध्यम से "आर्यभटीय" नामक ग्रन्थ में गणितीय सिद्धांतों की व्याख्या की है ।  अकबर के दरबार में मंत्री अबुल फजल ने अपने समय की घटनाओं को ‘आईने अकबरी‘ में लिखा है। वे लिखते हैं कि यूनानियों को भारतीय द्वारा पता लगाये गए वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के मध्य सम्बंध के रहस्य की जानकारी नहीं थी। इस बारे में ठोस परिज्ञान प्राप्त करने वाले भारतीय ही थे। आर्यभट्ट को ही पाई का मूल्य बताने वाला प्रथम व्यक्ति बताया गया है।
   हमारे देश के महान गणितज्ञों में दूसरा नाम आता है पिंगला जी का इन्होंने संस्कृत में छन्दशास्त्र की रचना की।इन्होंने"बैनोमियल थियोरम" अर्थात द्विपद प्रमेय के ज्ञान के बिना ही इन्होंने पास्कल त्रिकोण समझाया।कात्यान के 2 वर्गमूल की 5 सही दशमलव स्थानों से गणना हम कैसे भूल सकते हैं।नौवीं शताब्दी में जयदेव ने चक्रीय विधि विकसित की जिसे 'चक्रवला' के नाम से जाना जाता है ,इसी शताब्दी में हुए महावीरा नाम के दक्षिण भारतीय गणितज्ञ ने द्विघात और घन समीकरणों को हल करने की दिशा में बहुत योगदान दिया। रामानुज बहुत भारी गणितज्ञ हुये । गणित में पाई के अध्ययन का आसान तरीका उनकी ही देंन है ।  
  वैदिककाल से लेकर रामानुज तक भारत में गणित की एक लम्बी सुदीर्घ परम्परा मौजूद रही है । लेकिन वर्तमान में हमारी शिक्षा की व्यवस्था महान गणितज्ञ पैदा नहीं कर पा रही है तो इसलिये कि प्रतियोगिता पर आधारित हमारा शैक्षिक ढाँचा बच्चे को गणित की परीक्षा पास करने और प्रतियोगिता के लिए तैयार कर रहा है ,वह उसे गणित से  प्रेम नहीं सीखा रहा है ,इसीलिये गणित के मौलिक सिद्धांत और सूत्र अब जन्म नहीं ले पा रहे है । हमें अपनी कक्षाओं  में गणित की समझ पैदा करने वाले तरीके अपनाना होगा तभी ज्ञान की यह धारा आगे प्रवाहित हो सकेगी ।     
                                                                   पुष्पेन्द्र दीक्षित
                                                                134, दिलावरगंज
                                                                                       शाहजहाँपुर। 
                                                                                   मो ० -9044601505