संस्कृति ,अध्यात्म,दर्शन और विभिन्न विषयक स्तरीय ज्ञान भारतीयों के रक्त का रंग रहा है । यहां से ज्ञान की दीप शिखाएं लेकर भारतीय मनीषी अरब के रास्ते होते हुए यूनान तक जा पहुँचे । वे जहाँ -जहाँ से गुजरे ज्ञान का प्रकाश फैलाते चले गये । आज अनंत इकाइयों व दूरियों की गणना क्षणभर में हो जाती है ,तो इसका श्रेय भारत को ही जाता है ,भारत के ही भास्कराचार्य प्रथम ने
संख्या को दशमलव के रुप में हिंदू और अरबी शैली में लिखा था। भास्कराचार्य द्वितीय ने लीलावती ग्रन्थ लिखकर गणित के विभिन्न शाखाओं का सरलीकरण कर दिया । पाईथागोरस के नाम से प्रसिद्ध प्रमेय को उन्होंने १२ वीं शताब्दी में लिखी अपनी पुस्तक लीलावती में सिद्ध कर दिया था ।
भारत देश में गणित की पम्परा बहुत ही प्राचीन है और इसका उल्लेख शास्त्रों में भी मिलता है । याजुष ज्योतिषम में दिया हुआ है -
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।।
अर्थात् जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि सबसे ऊपर रहती है, उसी प्रकार वेदांग और शास्त्रों में गणित सर्वोच्च स्थान पर स्थित है।
भारतीय गणितग्यों की अति महत्वशाली उपलब्धि ‘शून्य’ का अविष्कार थी जिस के सहारे आज का विज्ञान आकाश की ऊचाईयों को छूने को तत्पर है। सर्व प्रथम शून्य अंक के प्रयोग का उल्लेख ईसा से 200 वर्ष पूर्व के धार्मिक ग्रँथों सें मिलता है। शून्य का अर्थ है – ‘कुछ नहीं’। पहले शून्य अंक एक बिन्दी के चिन्ह से दर्शाया जाता था। तदन्तर उस का आकार एक छोटे वृत की शक्ल का हो गया। इसी रूप में शून्य को अन्य अंकों की तरह से एक ‘अंक के तौर पर’ स्वीकार कर लिया गया।ईशवासोपनिषद उपनिषद में शून्य की सुन्दर परिभाषा इस प्रकार की गयी हैः-
ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।
भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है। यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक "कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है कि "गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्य देश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"
नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
भारतीय अंकों की विश्व यात्रा की कथा विश्व के अनेक विद्वानों ने वर्णित की है। इनका संक्षिप्त उल्लेख पुरी के शंकराचार्य श्रीमत् भारती कृष्णतीर्थ जी ने अपनी गणित शास्त्र की अद्भुत पुस्तक "वैदिक मैथेमेटिक्स" की प्रस्तावना में किया है।वे लिखते हैं कि इस संदर्भ में यह कहते हर्ष होता है कि कुछ तथाकथित भारतीय विद्वानों के विपरीत आधुनिक गणित के मान्य विद्वान यथा प्रो. जी.पी. हाल्स्टैंड. प्रो. गिन्सबर्ग, प्रो. डी. मोर्गन, प्रो. हटन- जो सत्य के अन्वेषक तथा प्रेमी हैं, ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया और प्राचीन भारत द्वारा गणितीय ज्ञान की प्रगति में दिए गए अप्रतिम योगदान की निष्कपट तथा मुक्त कंठ से भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
अंकों के क्रमों का विवेचन हमको यजुर्वेद के 39 अध्याय के छठे श्लोक में देखने को मिलता है -
सविता प्रथमेऽहन्नग्नि र्द्वितीये वायुस्तृतीयऽआदिचतुर्थे चन्द्रमा: पञ्चमऽऋतु:षष्ठे मरूत: सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे। मित्रो नवमे वरुणो दशमंऽइन्द्र एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे।
भारत और गणित का रिश्ता 400 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व अर्थात स्वर्ण युग तक माना जाता है।भारत के इतिहास मेंशून्य ही नही इसके अलावा भी कई उपलब्धियां विश्व के मानचित्र पर दर्ज़ कराईं हैं जैसे दशमलव प्रणाली,बीजगणित, उन्नत ट्रिग्नोमेट्री अर्थात त्रिकोणमिति आदि बहुत कुछ दिया है।
वैदिक काल 400 से 1200 का शास्त्रीयकाल तथा वर्तमान काल में हमारे देश में कई महान गणितज्ञ हुए जैसे आर्यभट्ट(476 -550 ) इनके नाम से शायद ही कोई अनभिज्ञ हो इन्होंने ही सिद्ध किया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है न कि सूरज ।इन्होंने ने ही वैज्ञानिक रूप से पहली बार चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण की अवधारणा को समझाया था।इन्होंने ही गणित के सिद्धांत को 332 श्लोकों के माध्यम से "आर्यभटीय" नामक ग्रन्थ में गणितीय सिद्धांतों की व्याख्या की है । अकबर के दरबार में मंत्री अबुल फजल ने अपने समय की घटनाओं को ‘आईने अकबरी‘ में लिखा है। वे लिखते हैं कि यूनानियों को भारतीय द्वारा पता लगाये गए वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के मध्य सम्बंध के रहस्य की जानकारी नहीं थी। इस बारे में ठोस परिज्ञान प्राप्त करने वाले भारतीय ही थे। आर्यभट्ट को ही पाई का मूल्य बताने वाला प्रथम व्यक्ति बताया गया है।
हमारे देश के महान गणितज्ञों में दूसरा नाम आता है पिंगला जी का इन्होंने संस्कृत में छन्दशास्त्र की रचना की।इन्होंने"बैनोमियल थियोरम" अर्थात द्विपद प्रमेय के ज्ञान के बिना ही इन्होंने पास्कल त्रिकोण समझाया।कात्यान के 2 वर्गमूल की 5 सही दशमलव स्थानों से गणना हम कैसे भूल सकते हैं।नौवीं शताब्दी में जयदेव ने चक्रीय विधि विकसित की जिसे 'चक्रवला' के नाम से जाना जाता है ,इसी शताब्दी में हुए महावीरा नाम के दक्षिण भारतीय गणितज्ञ ने द्विघात और घन समीकरणों को हल करने की दिशा में बहुत योगदान दिया। रामानुज बहुत भारी गणितज्ञ हुये । गणित में पाई के अध्ययन का आसान तरीका उनकी ही देंन है ।
वैदिककाल से लेकर रामानुज तक भारत में गणित की एक लम्बी सुदीर्घ परम्परा मौजूद रही है । लेकिन वर्तमान में हमारी शिक्षा की व्यवस्था महान गणितज्ञ पैदा नहीं कर पा रही है तो इसलिये कि प्रतियोगिता पर आधारित हमारा शैक्षिक ढाँचा बच्चे को गणित की परीक्षा पास करने और प्रतियोगिता के लिए तैयार कर रहा है ,वह उसे गणित से प्रेम नहीं सीखा रहा है ,इसीलिये गणित के मौलिक सिद्धांत और सूत्र अब जन्म नहीं ले पा रहे है । हमें अपनी कक्षाओं में गणित की समझ पैदा करने वाले तरीके अपनाना होगा तभी ज्ञान की यह धारा आगे प्रवाहित हो सकेगी ।
पुष्पेन्द्र दीक्षित
134, दिलावरगंज
शाहजहाँपुर।
मो ० -9044601505