अभी दो दिन पहले आदरणीय कवि अशोक चक्रधर ने कहा की वे कविता का स्कूल खोलेंगे । दरअसल कविता स्कूल में सीखने वाला ज्ञान नहीं है बल्कि सानिध्य अध्ययन और फिर चिंतन की विषयवस्तु है। कबीर तो घोषणा करते हैं की मसि कागज़ छुओ नहीं ,कलम गहि नहीं हाथ । अंधे सूर को अकादमिक ज्ञान कहाँ उपलब्ध था लेकिन आज इन्हीं के एक एक दोहे और पद पर सैकड़ों लोगों ने डाक्टरेट हासिल की । आज जरूरत स्कूल की नहीं बल्कि उन युवकों को खोजने की है जिन के अंदर कविता के अंकुर फूटने के बाद बिना खाद पानी के मुर्झाने लगे हैं । उन्हें प्रकाश में लाने की जरूरत है । प्रोत्साहित करने की जरूरत है । मंच देने की जरूरत है । प्रवाह संस्था पिछले १६ सालों से यही कर रही है । उसका उद्देश्य ही नए कवियों को बढ़ावा देना और उनकी शैली को और प्रभावशाली बनाना है । उसने कई ऐसे बेजोड़ कवियों को सुधी समाज से परिचित कराया जिन्होंने कालजयी रचनाये लिखी हैं । इसके लिए प्रवाह ने दो तरीके अपनाये । पहला यह की महीने में एक गोष्ठी अवश्य होगी और दूसरा यह की हर गोष्ठी में एक नई कविता अवश्य सुनानी होगी । संस्था को तत्कालीन नामचीन कवि डॉ गिरजानन्द आकुल , दादा राजबहादुर विकल का संरक्षण प्राप्त था । इसके चलते कई युवक नवोदित से थोड़ा बड़े हुए फिर अवसर पा कर स्थापित हो गए । इस बीच प्रवाह ने अपने प्रकाशन से अपने सदस्य कवियों का डॉ प्रशांत अग्निहोत्री व डॉ राजीव सिंह के सम्पादन में एक संकलन भी निकाला । प्रवाह में सबसे खास बात यह है की हर साल इसका अध्यक्ष और सचिव बदल जाता है जिससे नए कवि को भी अध्यक्ष या सचिव बनने का अवसर मिल जाता रहा । इससे भी नवोदित कवियों का उत्साह बढ़ता । सस्था किसी से चंदा नहीं लेती न सदस्यता शुल्क बस साल में (अब १८ सदस्य संख्या हो जाने पर डेढ़ साल में )एक बार गोष्ठी करनी होती है । हालांकि प्रारम्भ में प्रवाह में केवल बारह सदस्यों का चलन था। पिछले वर्ष इसे समाप्त कर दिया गया ।
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