साहित्यिक संस्था प्रवाह की काव्यगोष्ठी सेन्ट्रल वार ऐशोसियशन कचहरी के सभागार में संपन्न हुई ।
सेन्ट्रल वार के पूर्व अध्यक्ष ब्रजेश निश्र द्वारा सरस्वती वंदना से प्रारम्भ हुई काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश अडिग सामाजिक कृत्रिमता को निशाना बनाया ---
सबने तो मुझसे यही कहा
तुम भी इसको स्वीकार करो
अंदर से चाहे घृणा करो
ऊपर से लेकिन प्यार करो
अपने कन्नौजी लोकगीतों के लिए मशहूर कवि विजय ठाकुर ने पारिवारिक विघटन का दर्द प्रकट किया --------
जोड़ता मैं रहा मेरा घर बाट गया
पहले सीना बटा फिर जिगर बाट गया
विलुप्त होती ख्यालगायकी के एकलौते स्तम्भ लल्लन बाबू ने वर्त्तमान समय में जिन्दा रहने को भी संघर्ष बताया -----------
इससे बढ़ कर और क्या होगी कमले जिंदगी
जिंदगी भर हल न कर पाये सवाल जिंदगी
खिज्र की भी उम्र मिल जाती तो क्या करते जनाब
चार दिन ही हो गए हैं जब बबाल जिंदगी
प्रसिद्द गीतकार कमल मानव ने सौंदर्य के विभिन्न आयामों की व्याख्या की --------
इसका न कभी भी क्षय होता
यह तो अमृत की प्याली है
सुंदरता अक्षय सुंदरता
मणिदीपों की दिवाली है
आक्रोश के कवि सुशील दीक्षित विचित्र ने सामाजिक विद्रूपता पर व्यंग किया ------
अव्यवस्था का कुम्भकर्ण
हम सब के सर पर सो रहा है
कामधेनु का बछड़ा
सौ ग्राम दूध को रो रहा है
वीर रास के कवि हरिओम शुक्ल ओमी ने पाकिस्तान को चुनौती देते हुए कहा -------
हो चूका है समझौते वालो नीतियों का अंत
सत्ता में
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