शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

                                        भैंस      
                                                       आगे चल कर जरूरतों के  हिसाब से कृषि में सुधार किये  जाने लगे । खेत जोतने की अनिवार्यता से पशुपालन की ओर ध्यान गया । गोवंश इसके लिए उपयुक्त पाया गया और इस तरह पशुपालन की परंपरा पड़ी । कालांतर में फुर्तीले बैलों की अपेक्षा जब अधिक बलवान पशु की जरूरत महसूसकी गयी तो  गाय का विकल्प तैयार करने के लिए सनातन सभ्यता के वाहक विद्वान ऋषि प्रयोगों में लग गए । सफलता मिली वशिष्ठ मुनि को। उन्होंने दुधारू पशुओं पर विभिन्न तरह के प्रयोग किये । बाद में उनके इन प्रयासों से भैंस का आविष्कार हुआ । अब  कृषि  अपने प्रारम्भिक दौर से गुजर कर तत्कालीन आधुनिक युग में प्रवेश करने लगी थी । कृषि के उन्नत होते ही यह समाज की आजीविका का भी प्रमुख माध्यम बन गयी । यह वह काल था जब मानव में पाषाण युग की छाया भी नहीं बची थी । वामपंथी विचारक इसे कपोलकल्पित मानते हैं लेकिन उनके ऐसा मानने से यह सच्चाई छुप नहीं जाती कि सिंध और बलूचिस्तान की सीमा पर बोलन  नदी के किनारे के विशाल मैदान में गेहूँ  और जौ की जो कई किस्में पाई गयी हैं  उन्हें विद्वानों ने १० से ७ हजार वर्ष पुराना बताया है। इससे प्रमाणित होता है की भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तर-पश्चिमी भाग गेहूं और जौ  के मूल क्षेत्र में आता है ।  दक्षिण भारत में  बाजरे की जो किस्म पायी गई है वह इस से तीन हजार साल पुरानी है।
                                                    सब बातों को छोड़ दें और प्रमाणों को भी झुठला दें फिर भी यह सत्य झुठलाना किसी के लिए संभव नहीं की भारत की अर्थव्यवस्था अनादि काल से कृषि आधारित रही है । कृषि के लिए गाय न केवल  उपयोगी है वरन अर्थव्यवस्था की दूसरी मजबूत कड़ी है इसलिए वह गौमाता हो कर पूज्य हुई । सनातनी परंपरा आज भी जारी है । गाय का महत्त्व भले ही उतना न रहा हो लेकिन आज भी भारत एक  कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है ।

                                               









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