सनातन संस्कृति और कृषि
आज जो परिस्कृत कृषि दिखाई पड़ रही है यह सदैव से ऐसी ही नहीं थी । भारत को कृषि प्रधान देश बनने के पीछे सनातन सभ्यता का लम्बा संघर्ष छिपा है। जल प्रलय की महान घटना के बाद बचे हुए लोगों ने फिर से श्रष्टि सम्पादन की व्यवस्था की । इस दौरान दो बड़ी बड़ी घटनाएं और घटी। जल प्रलय के दौरान यहां से पलायन कर गए मनु अपने दामाद बुध के साथ वापस आये और उन्होंने अयोध्या की स्थापना की । यह वंश कालान्तर में सूर्य वंश के नाम से जाना गया । उधर बुध ने प्रतिष्ठान पर की स्थापना की जिसके अवशेष आज भी झूंसी में मिलते हैं । बुध चन्द्र के पुत्र थे । उन्होंने अपने पिता के नाम पर चन्द्र वंश की स्थापना की ।
मनु से राजा वेन तक राज्य की कोई व्यवस्था नहीं थी । कोई सामाजिक ,आर्थिक या कृषिक विभाग नहीं था । इसलिए कृषि नहीं होती थी । प्रजा जंगल में ऐसे ही बीज फेंक देती थी । जो अनाज हो जाता था वहीँ उपयोग में लाया जाता था । इसी तरह जंगलों में भटकती हुई गायों को पकड़ कर दुह लिया जाता था और फिर उन्हें छोड़ दिया जाता । अलबत्ता मनु ने राज्य के लिए कुछ विधान बना दिए थे। जल प्रलय की विभीषिका से उबर कर सनातन संस्कृति आकार लेने लगी थी ।
यूही फेंके गए बीजों से पर्याप्त फसल नहीं होती थी । काफी बीज या तो खराब हो जाता था या पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था । भूमि असमतल थी जिससे बस्तियां नहीं बस पा रहीं थी । बिष्णु पुराण के अनुसार पृथ्वी के समतल न होने से पुर ग्राम आदि के कोई नियमित विभाग नहीं थे । अन्न , गोरक्षा , कृषि और व्यापार का कोई क्रम नहीं था । वेन के पुत्र पृथु ने पहली बार इस ओर ध्यान दिया । उन्होंने भूमि को समतल किया । उसे जोत कर बोने की परम्परा शुरू की । भूमि समतल होने से बस्तियां बसने लगीं । पुर और ग्राम आकार लेने लगे । इन्ही राजा पृथु के नाम पर भूमि पृथ्वी कहलाई । अगर हम बहुत सभ्यता निर्माण के कारकों को बहुत गहरी नजर से देखें तो बस्तियो के अस्तित्व में आने का सब से पहला कारक कृषि ही था । अब खानाबदोश जैसी स्थिति समाप्त हो चली थी । खेत बने तो उनकी रक्षा के लिए उनके आसपास रहना जरूरी लगा । जंगली जानवरों से रक्षा के लिए झुण्ड में रहना और पास पास घर बनाना जरूरी लगा और इस तरह सनातन सभ्यता की संस्कृति का बहुत धीरे धीरे तानाबाना बुना जाने लगा ।
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