किसी भी सभ्यता के सभ्य होने के लिए जरूरी है की उसका एक मर्यादित अनुशाषित समाज हो । समाज स्वाबलंबी हो और उसे उचित संस्कार दिए गए हों । सनातनवादी हिन्दू सभ्यता को सम्पूर्ण आकर देने केलिए पहली बार मनु ने समाज में मर्यादा स्थापित की । उन्होंने पहली बार जल चर ,नभ चर और थल चर के अलावा सृष्टि के अन्य उपादानों , यथा वनस्पति आदि का भी वर्गीकरण किया । समाज को रक्षा , शिक्षा , व्यापार और दैहिक श्रम के आधार पर चार विभागों में बाटा । समाज को संचालित करने के लिए कुछ नियम और क़ानून बनाये। हर विभाग की सीमाएं निर्धारित कीं । इस तरह मनु स्मृति की रचना हुई । यह कानून की ही नहीं राजनीति ,समाजशास्त्र , अर्थशास्त्र , और विज्ञान की भी पहली पुस्तक है ।सारी दुनिया में आज भी जो कानून प्रचिलित हैं उनमें से अधिकाँश मनुस्मृति के चारों ओर घूमते है।
फिलवक्त बात सभ्यता के सभ्य होने के लिए जरूरी तत्वों की हो रही थी । मनुस्मृति के आधार पर एक अनुशाषित और मर्यादित सनातन समाज की स्थापना की गयी । चारो विभागो को काम का बटबारा कर दिया गया और उनके नाम नीधारित कर दिए गये। रक्षा विभाग के लोग क्षत्री , शिक्षा के पंडित व्यापार के बणिक और श्रमिक समाज के लोग शूद्र कहे गये। समाज में बिखंडन और प्रतिभा पलायन रोकने के लिए यह भी तय किया गया गया पंडित , शूद्र , क्षत्री या बणिक जन्म से नहीं होगा बल्कि कर्म से होगा । समाज जाति आधारित नहीं बल्कि कर्म आधारित होगा । इस तरह जो पहला सभ्य सनातन समाज सामने आया वह एक स्वाबलंबी , अनुशासित और संस्कारित समाज था जिसकी संसकृति नितांत मानवीय मूल्यों के आधार पर गढ़ी गयी । कालांतर में समाज को और लचीला करने तथा समयानुकूल बनाने के लिए और भी कई स्मृतियों के नाम पर कानूनी पुस्तकें आई और तब जा कर हिन्दू सभ्यता जीने बाले एक मुकम्मिल , सम्पूर्ण समाज का विकास हुआ |
इस मर्यादित और संस्कारित समाज को भी स्वतंत्र नहीं छोड़ दिया गया बल्कि धर्म की रज्जु से बाँधा गया ताकि यह उश्रंखल न हो सके। यद्यपि धर्म के धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश मे रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध) आदि दस लक्षण दिए गए हैं लेकिन वास्तव में ऋषियों ने परहित को धर्म का मूल बताया है और धर्म को कर्तव्य से जोड़ा है। आज यह मन लिया जाता है की धर्म पूजा पाठ की कोई पद्धति है। अन्य मतान्तरों में होगी लेकिन हिन्दू समाज मानता है की अपने कृतव्यों का पालन करना और दूसरों का हित करना ही सच्चा धर्म है। इसी
फिलवक्त बात सभ्यता के सभ्य होने के लिए जरूरी तत्वों की हो रही थी । मनुस्मृति के आधार पर एक अनुशाषित और मर्यादित सनातन समाज की स्थापना की गयी । चारो विभागो को काम का बटबारा कर दिया गया और उनके नाम नीधारित कर दिए गये। रक्षा विभाग के लोग क्षत्री , शिक्षा के पंडित व्यापार के बणिक और श्रमिक समाज के लोग शूद्र कहे गये। समाज में बिखंडन और प्रतिभा पलायन रोकने के लिए यह भी तय किया गया गया पंडित , शूद्र , क्षत्री या बणिक जन्म से नहीं होगा बल्कि कर्म से होगा । समाज जाति आधारित नहीं बल्कि कर्म आधारित होगा । इस तरह जो पहला सभ्य सनातन समाज सामने आया वह एक स्वाबलंबी , अनुशासित और संस्कारित समाज था जिसकी संसकृति नितांत मानवीय मूल्यों के आधार पर गढ़ी गयी । कालांतर में समाज को और लचीला करने तथा समयानुकूल बनाने के लिए और भी कई स्मृतियों के नाम पर कानूनी पुस्तकें आई और तब जा कर हिन्दू सभ्यता जीने बाले एक मुकम्मिल , सम्पूर्ण समाज का विकास हुआ |
इस मर्यादित और संस्कारित समाज को भी स्वतंत्र नहीं छोड़ दिया गया बल्कि धर्म की रज्जु से बाँधा गया ताकि यह उश्रंखल न हो सके। यद्यपि धर्म के धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश मे रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध) आदि दस लक्षण दिए गए हैं लेकिन वास्तव में ऋषियों ने परहित को धर्म का मूल बताया है और धर्म को कर्तव्य से जोड़ा है। आज यह मन लिया जाता है की धर्म पूजा पाठ की कोई पद्धति है। अन्य मतान्तरों में होगी लेकिन हिन्दू समाज मानता है की अपने कृतव्यों का पालन करना और दूसरों का हित करना ही सच्चा धर्म है। इसी
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