शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

संवेदनाओं से ओतप्रोत

                                                           
                                                           सभ्यता बनाम  संस्कृति

हिन्दू सभ्यता और संस्कृति  के बीच मूलभूत अंतर यह कहा जा सकता है की हिन्दू  सभ्यता बदलती नहीं जबकि  हिन्दू संस्कृति अधिक परिवर्तनशील है। सभ्यता की कोख से ही संस्कृति पैदा होती है जिसे सभ्यता को जीने वाली पीढ़ी समय समय पर अपने हिसाब से बदलती रहती है। किसी भी सभ्यता को सनातन होने के लिए उसकी संस्कृति का  परिवर्तनशील होना पहली शर्त है । जो सभ्यता  बदलते समय के साथ खुद को  नहीं बदलती है  कालांतर में न वह सभ्यता बचती है और न उसकी संस्कृति । सनातन धर्म को अमली जामा पहनाते समय भारतीय मनीषियों ने अपने अनुभव से यह  बखूबी समझ लिया था कि शाश्वत रहने , सनातन रहने,चिरजीवी रखने के  लिए  सबसे जरूरी तत्व समय  के साथ कदमताल करना हैं । यही कारण हैकि वेदों में अपार ज्ञान का भण्डार भरने के बाद भी अंत में रचनाकार को यही लिखना पड़ा की नेति ,नेति, नेति  अर्थात और है, और है , और है। ज्ञान का अंत नहीं। ऋग्वेद  की समाप्ति के बाद उसके आगे और है और है  की  दुहाई देनी पड़ी फिर यजुर्वेद , सामवेद और अथर्व वेद लिखे गए  रचनाकार ज्ञान की सम्पूर्णता का दावा नहीं कर सके ।  बाद में उपवेद लिखे गए , उपनिषद लिखे गए, पुराण रचे गए  और न जाने कितने ग्रंथों की रचना हुई लेकिन अंत में हमेशा यही पाया गया की ज्ञान का अंत नहीं । यही ज्ञान  सभ्यता को  लचीली संस्कृति गढ़ने के लिए प्रेरित करती है । ऐसी संस्कृति जो सभ्यता की ढाल  बन कर उसे हर हमले से बचाये । जो समय  की सुनामी में खुद को झुका कर निकाल ले जाए   ठीक वैसे ही जैसे बाढ़ आने पर नदी  बड़े बड़े पेड़ जड़ सहित उखाड कर बहा  ले जाती  हैं लेकिन बांस  झुक कर पानी का हर बार बेकार कर देते हैं और अपने स्थान पर अटल खड़े रहते हैं । यही लचीलापन हिंदुत्व की ताकत है। विदेशी हमलों का सैलाब उसे बहा नहीं सका । वह अपने स्थान पर अटल खड़ा है जब की शक मिट गए हूण मिट गए, यूनानी मिट गये और वे सब हिंदुत्व में समाहित हो गये।
                                एक समय था जब अमरीका में माया सभ्यता ग्वाटेमाला , मैक्सिको , होंडुरस तथा यूकाटन  प्रायद्वीप तक फैली थी और स्थापत्य कला की विशेषज्ञ  थी । यह ३५ हजार साल पूरा समय था लेकिन ११वी शताब्दी आते आते सभ्यता का पतन शुरू हो गया और  सोलवीं शताब्दी में माया सभ्यता इतिहास बन कर खोज का विषय हो गयी । इतिहासकार मानते हैं कि सीमेरियन सभ्यता सबसे पुरानी है। किसी समय दक्षिण ईराक में इनका अधिपत्य था। यह भी ऊँचे दर्जे की सभ्यता मानी गयी है । इन  सिंधु घाटी के लोगों से व्यापारिक सम्बन्ध थे । आज इसके बनाएं खँडहर रह गए हैं । यह और इनके समक्ष पनपी सभ्यताएं केवल इसीलिए मिट गयीं क्यूंकि वे परिवर्तनशील संसकृति की संरचना नहीं कर सकीं । वे परमो धर्म हित: नहीं हो सकीं बल्कि पूर्वाग्रह के खोल में सिमट कर समय के साथ खुद  को बदल नहीं पायीं और समय ने भूगोल से उन्हें इतिहास के पन्नों में समेत दिया ।
                           हिंदुत्व की एक और बड़ी ताकत है , उसका खुलापन । यहां धार्मिक परम्पराए या आस्था किसी पर थोपी नहीं जाती । एक ही परिवार में पिता आर्यसमाजी हो सकता है , पुत्र नास्तिक हो सकता है, पुत्री शैव  और माँ वैष्णव हो सकती है  और यह सब एक ही छत के नीचे ,एक ही थाली के आसपास  एक साथ बैठ कर निसंकोच भोजन कर सकते हैं । पूजा गृह में सभी धर्मों की पुस्तकें सामान आदर के साथ रखी और पढ़ी जा सकती हैं ।   दरअसल हिंदुत्ववादी परंपरा की धारणा है कि पंथ या मजहब मात्र माध्यम हैं  जबकि असल उद्देश्य उस सत्य के  उन तत्वों की तलाश है जो मानवता के लिए हितकारी हों और विश्व वन्धुत्व के प्रेरक हो।  अठारवीं शताब्दी में जब अंग्रेजों ने विभिन्न विषयों पर आधारित सैकड़ों किताबें  भारत से योरोप भेजी तो वहां के विद्वान उन्हें पढ़ कर दंग रह गए और वे भी इस नतीजे पर पहुंचे  हिन्दुओं की हर विषय पर अनोखी पकड़ है और वे उन सभी के माध्यम से अंततः मानवता को मजबूत किया चाहते | मैकाले ने एक बार कहा था की जब हम  उच्चकोटि की सभ्यता की तलाश करते हैं तो हमें भारत की ओर देखना होता है । जब हम उच्चकोटि के दर्शन  की बात करते हैं तब भी हमें भारत की ओर देखना पड़ता है ।
                        किसी भी  सभ्यता  के सभ्य होने के लिए जरूरी है की उसका  एक  मर्यादित अनुशाषित समाज हो । समाज स्वाबलंबी हो और  उसे उचित संस्कार दिए गए हों । सनातनवादी हिन्दू सभ्यता को सम्पूर्ण आकर देने केलिए पहली बार मनु ने समाज में मर्यादा स्थापित की ।






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