सोमवार, 13 अप्रैल 2015

       बरात जब चली तो नौ से ऊपर का समय हो गया था । लोकल बारात होने के कारण इसे गनीमत समय माना गया । बारात जिस मैरिज लान में जानी थी वह एक किलोमीटर से अधिक दूर नहीं था। मोहल्ले की बारात थी इसलिए पड़ोसी दद्दू भी साथ थे । हालांकि दद्दू किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं फिर भी यह बताना  नैतिक कर्तव्य हो जाता है कि  दद्दू किसी के दद्दू नहीं थे , दरअसल वे दद्दू कभी थे है नहीं । वे तो  देवी दास दुबे थे । लेकिन पता नहीं कब शुरू के तीनों द  मथानी से फेरे गए और एक  नया नाम  निकाला गया  दद्दू। दद्दू  अपने को सर्व ज्ञानी मानते हैं ।

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