बरात जब चली तो नौ से ऊपर का समय हो गया था । लोकल बारात होने के कारण इसे गनीमत समय माना गया । बारात जिस मैरिज लान में जानी थी वह एक किलोमीटर से अधिक दूर नहीं था। मोहल्ले की बारात थी इसलिए पड़ोसी दद्दू भी साथ थे । हालांकि दद्दू किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं फिर भी यह बताना नैतिक कर्तव्य हो जाता है कि दद्दू किसी के दद्दू नहीं थे , दरअसल वे दद्दू कभी थे है नहीं । वे तो देवी दास दुबे थे । लेकिन पता नहीं कब शुरू के तीनों द मथानी से फेरे गए और एक नया नाम निकाला गया दद्दू। दद्दू अपने को सर्व ज्ञानी मानते हैं ।
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