सनातन सभ्यता --- धर्म और संस्कृति तक
सनातन सभ्यता कितनी पुरानी है और कब यह धर्म और संस्कृति में ढल गयी, यह गहन विवेचना का विषय हो सकता है लेकिन यह निर्विवाद है सनातन धर्म की अवधारणा नितांत वैज्ञानिक आधार पर की गयी और उसी विज्ञान की कसौटी पर कस कर सनातन संस्कृति का भवन निर्मित किया गया । इस भवन को खड़ा करने में न जाने कितने ऋषियों , मुनियों , विद्वानों ने अपना योगदान दिया और सनातन धर्म के क्षेत्र भारत को विश्व गुरू बनाया । मानवीय संवेदनाएं सनातन धर्म की थाती हैं , वसुधैव कुटुंबकम उसका विश्वास है और सर्वे भवन्तु सुखिना उसका सपना है । वह कल्याणकारी सुन्दर सत्य का उपासक है । वह "मैं " का नहीं "हम " का पक्षधर है ।समाज को परिवार मान कर स्थापित मर्यादाओं का पालन करना सनातन सभ्यता है जो अनेकता में एकता का सम्भाव लिए हुए है और उसकी संस्कृति प्रयोगधर्मा हैं| समय के साथ गलबहियां करके चलने की आदत रही है सनातन सभ्यता और उसकी संस्कृति को
सनातन सभ्यता के साथ और बाद में भी कई सभ्यताए पनपी और फैली लेकिन वे अपने की सुरक्षित नहीं रख सकीं और अतीत का पन्ना बन गयी लेकिन अपने लचीले पण के कारण सनातन सभ्यता जस की तस खड़ी रही । कालांतर में विदेशी हमलों का एक भयावह दौर चला । सिंधु नदी के कारण सनातन सभ्यता का हिन्दू नाम से नया नामकरण हुआ । अमूमन इतिहासकारों का मानना है की विदेशी हमलावर 'स' को 'ह' बोलते थे। इसके चलते उन्होंने सिंधु को हिन्धु कहा जो समय के हाथों घिस कर हिन्दू हो गया । लेकिन यह थ्योरी भ्रामक है। यदि विदेशी हमलावर 'स' को 'ह' बोलते थे तो उन्हों इस्लाम को इहलाम, मुसलमान को मुहलमान ,ईसा मसीह को ईहा महीह और मोहम्मद साहब को मोहम्मद हाहब क्यों नहीं कहा ? इसलिए यह कहना की वे 'स' को 'ह' बोलते थे एक गढा हुआ भ्रामक तथ्य है । अलबत्ता यह माना जा सकता है की सिंधु तटवासी होने के कारण उन्हें पहले सिंधु पुकारा गया हो जो बाद में घिस कर कालांतर में हिन्दू हो गया ।
हिन्दू संस्कृति का ध्येय वाक्य रहा है तमसो मा ज्योतिर्गमय । अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की इस प्रवृत्ति ने हिन्दुओं की ज्ञान पिपासा को हमेशा जगाये रखा और उसकी सत्य की खोज जारी रही जो उसे मनुष्यत्व की ओर चलने को प्रेरित करती रही है। विद्वान दार्शनिकों का मानना है की कोई संस्कृति तभी सभ्यता बन सकती है जब उसके पास लिखित भाषा, दर्शन, श्रम विभाजन और राजनैतिक प्रणाली हो । हिन्दू की हिंदुत्ववादी विचारधारा के पास यह सब है। उसके पास संस्कृत जैसी सामर्थ्यवान लिखित भाषा है । दर्शन की उसकी प्राचीन परंपरा जो आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही तरह का दर्शन प्रस्तुत करने में समर्थ है। हिन्दू सभ्यता जो वर्ण व्यवस्था प्रस्तुत करती है वह श्रम विभाजन का अनुपम उदाहरण है । यहां अलग अलग समाजोपयोगी काम करने वालों के अलग अलग विभाग बना दिए गए जो बाद में जातियों में तब्दील हो गये। राजनीतिक प्रणाली भी भारत की हमेशा विश्व में असमानंतर रही है। तमाम तरह की संहिताओं में सामाजिक, राजनीतिक , कानूनी और विदेशी जैसे सभी मुद्दों पर खुल कर चर्चा ही नहीं की गयी बल्कि राजा और प्रजा दोनों ही के कर्तव्यों और अधिकारों का निर्धारण किया गया है। आगे चाणक्य ने राजनीतिक सिद्धांतों के जो सोपान गढे , सदियों बाद भी सारे विश्व की राजनीति उन्हीं सिद्धांतों के चारों और घूम रही है ।
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