अवधेश वर्मा
इधर उधर हैं डोलते ,जहां तहाँ बतियात ।
जबसे उखड़े जड़ों से ,नहीं बन रही बात ।
जुगत अब नई निकालो ॥
चिन्मयाननद
राजनीति में ख़त्म अब, हुआ आप का खेल ।
वेद पुराण निकाल कर , उनको धरो रुहेल ।
और फिर प्रेम से वांचो ॥
कोविद कुमार सिंह
आखिर भूला आ गया लौट के अपने गाँव ।
चूक गए इस बार तो कहीं नहीं है ठाँव ।
समझ कर दांव लगाना ॥
शरदवीर सिंह
अकुए भकुए तक यहाँ , कमा रहे हैं नाम ।
सीधेपन से कब तलक चला सकोगे नाम ।
सोंच कर खुद ही देखों ॥
वीरेंद्र पाल सिंह यादव
चरण पखारे चूम ले , कभी कभी ले चाट ।
राजभवन में डाल ले , चाहे अपनी खाट ।
काम करना ही होगा ॥
कौशल मिश्रा
दल दलदल में डूबता, नहीं रहा ये राज।
प्यारे कैसे करोगे , तुम अच्छा आगाज ।
कठिन है डगर आप की ॥
कौशल मिश्रा
दल दलदल में डूबता, नहीं रहा ये राज।
प्यारे कैसे करोगे , तुम अच्छा आगाज ।
कठिन है डगर आप की ॥
प्रदीप पाण्डेय
पांडे भैया आ गए , घोट छान कर भंग ।
अपनो से ही हार कर, सभी तरह की जंग ।
खेत चरते सहकारी ॥
देवेन्द्र पाल सिंह
हुई विधायकी स्वप्न अब , ख़त्म हुई पहचान ।
तुम्हे देख कर हो रहे , लोग बहुत हैरान ।
कहाँ के तुम हो नेता ?
चेतराम
सोंचा था लग जाएगी ऊँची एक छलांग ।
लेकिन जनता ने दिया ,फिर से तुमको टांग ।
हार वाली खूंटी पर ॥
अपराधी और पुलिस में लुका छिपी का खेल ।
बहुत पुराना हैं मगर , इस पर लगे नकेल ।
चैन पाये तब जनता ॥
सुशील विचित्र
वाणी में आक्रोश है , कविता जैसे ज्वाल ।
विक्रम को है खोजता, साहित्यक वेताल ।
श्वान की दुम सा टेढ़ा ।
कमल मानव
लोगों को छोड़ो सखा , खुद भी खोजो राह ।
जीवन में तब आएगा , प्यारे नया उछाह ।
गीत के गाँव बसाओं ॥
वृजेश मिश्र
यहां वहां से अब जरा, आगे बढ़ो सुजान ।
क्यों श्रोता की खींचते ,फटे गले से टांग ।
चाल भी थोड़ी बदलो ॥
डॉ० प्रशांत अग्निहोत्री
कुत्ता , गायें , भैसियां भैया की दूकान ।
कविता का इनके लिए , यह कच्चा सामान ।
शिकारी खुद शिकार है ॥
उमेश चन्द्र सिंह
गला पकड़ कर व्यंग का , खूब रहे झकझोर ।
श्रोता इनका नाम सुन, देखे चारो ओर ।
भागने वाला रस्ता ॥
पांडे भैया आ गए , घोट छान कर भंग ।
अपनो से ही हार कर, सभी तरह की जंग ।
खेत चरते सहकारी ॥
देवेन्द्र पाल सिंह
हुई विधायकी स्वप्न अब , ख़त्म हुई पहचान ।
तुम्हे देख कर हो रहे , लोग बहुत हैरान ।
कहाँ के तुम हो नेता ?
चेतराम
सोंचा था लग जाएगी ऊँची एक छलांग ।
लेकिन जनता ने दिया ,फिर से तुमको टांग ।
हार वाली खूंटी पर ॥
अपराधी और पुलिस में लुका छिपी का खेल ।
बहुत पुराना हैं मगर , इस पर लगे नकेल ।
चैन पाये तब जनता ॥
सुशील विचित्र
वाणी में आक्रोश है , कविता जैसे ज्वाल ।
विक्रम को है खोजता, साहित्यक वेताल ।
श्वान की दुम सा टेढ़ा ।
कमल मानव
लोगों को छोड़ो सखा , खुद भी खोजो राह ।
जीवन में तब आएगा , प्यारे नया उछाह ।
गीत के गाँव बसाओं ॥
वृजेश मिश्र
यहां वहां से अब जरा, आगे बढ़ो सुजान ।
क्यों श्रोता की खींचते ,फटे गले से टांग ।
चाल भी थोड़ी बदलो ॥
डॉ० प्रशांत अग्निहोत्री
कुत्ता , गायें , भैसियां भैया की दूकान ।
कविता का इनके लिए , यह कच्चा सामान ।
शिकारी खुद शिकार है ॥
उमेश चन्द्र सिंह
गला पकड़ कर व्यंग का , खूब रहे झकझोर ।
श्रोता इनका नाम सुन, देखे चारो ओर ।
भागने वाला रस्ता ॥
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