कमल मानव
तन से तो अस्वस्थ हो, हमने माना यार |
लेकिन मन जब स्वस्थ हो , फिर काहे बीमार ।
लिखो फिर नई वंदना ॥
सुशील विचित्र
काव्य जगत में आप यूँ ,जैसे छुट्टा सांड ।
इन्हे देख कर कांपते ,सब कविता के भांड |
कलम को समझे लाठी ॥
डा० प्रशांत अग्निहोत्री
क्योंकर छज्जे पर खड़े दिन देतो हो काट ।
सड़क सिलेटी पर लगी नव गीतों की हाट ।
लिखेंगे नया पुथिन्ना ॥
बृजेश मिश्र
पहले दावेदार थे, अब हैं तावेदार ।
झुके कोर्निश कर रहे हो तुम जिस दरबार ।
वहां अब मचता खिच्चू ॥
उमेश चन्द्र सिंह
गजल चीखती फिर रही माथा फोड़े व्यंग ।
अपनी शैली पर नहीं चढ़ता कोई रंग ।
सभी को गाँव दिखाते ॥
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