घमासान
सुशील "विचित्र "
एक बार मैने भी एक वीर रस की कविता गाढ़ी ,
ओजमय स्वर से जब कविसम्मेलन में पढ़ी
तो सुन कर श्रोताओं की छातियाँ धड़कने लगीं
भुजाएं फड़कने लगीं
कुछ करने को
लड़ने मरने को
उनमें से कुछ उठे और संयोजक को तलाशने लगे
कुछ अचानक अपने पड़ोसी को धकियाने लगे
कुछ एक दूसरे को गलियाने लगे /
कुछ ने कुछ के कपड़े फाड़ दिए
कुछ ने टेन्ट के बांस हथियार बना कर
अपनी बहादुरी के झंडे गाड़ दिए /
कुछ ने मंच के खिलाफ मोर्चा खोल दिया
अधिकतर ने मुझ पर ही हल्ला बोल दिया
तत्काल मंच से नीचे खिंच लिया गया
भाग न सकूँ इसलिए कस कर भींच लिया गया
ऐसी हुई हाथापाई
एक ही मिनट में मेरा पैन्ट हो गया लघोट
कमीज हो गयी टाई /
जैसे कपडे को धोता हो धोबी
फूल सा चेहरा बना दिया गोभी
तब से पकड़ लिए हैं कान
सुनलो श्रोताओं महान
हर रस की कविता गढूंगा
हर रस के शिखर पर उतरूंगा ,चढूंगा
लेकिन वीर रस की कविता कभी नहीं पढूंगा /
136 ,दिलवरगंज
शाहजहाँपुर --242001
मोबा --9559706019
सुशील "विचित्र "
एक बार मैने भी एक वीर रस की कविता गाढ़ी ,
ओजमय स्वर से जब कविसम्मेलन में पढ़ी
तो सुन कर श्रोताओं की छातियाँ धड़कने लगीं
भुजाएं फड़कने लगीं
कुछ करने को
लड़ने मरने को
उनमें से कुछ उठे और संयोजक को तलाशने लगे
कुछ अचानक अपने पड़ोसी को धकियाने लगे
कुछ एक दूसरे को गलियाने लगे /
कुछ ने कुछ के कपड़े फाड़ दिए
कुछ ने टेन्ट के बांस हथियार बना कर
अपनी बहादुरी के झंडे गाड़ दिए /
कुछ ने मंच के खिलाफ मोर्चा खोल दिया
अधिकतर ने मुझ पर ही हल्ला बोल दिया
तत्काल मंच से नीचे खिंच लिया गया
भाग न सकूँ इसलिए कस कर भींच लिया गया
ऐसी हुई हाथापाई
एक ही मिनट में मेरा पैन्ट हो गया लघोट
कमीज हो गयी टाई /
जैसे कपडे को धोता हो धोबी
फूल सा चेहरा बना दिया गोभी
तब से पकड़ लिए हैं कान
सुनलो श्रोताओं महान
हर रस की कविता गढूंगा
हर रस के शिखर पर उतरूंगा ,चढूंगा
लेकिन वीर रस की कविता कभी नहीं पढूंगा /
136 ,दिलवरगंज
शाहजहाँपुर --242001
मोबा --9559706019
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