बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

 व्यंग्य                                                         
                                                        हार   के कारणों की क्रियात्मक खोज
                                                                                        सुशील " विचित्र "

                                              भारी पराजयबोध से ग्रसित पार्टीजन पार्टी की सहसा हुई अधोगति पर चर्चा करने के लिए  मुरझाये पड़े कमल के आसपास  एकत्र  हो चुके थे । अध्यक्ष ने सचिव को गुप्त इशारा किया । सचिव एक रजिस्टर लेकर खड़े हो गए । उन्होंने दो बार खखारा , तीन बार दायें बाएं देखा  फिर अपनी आवाज को  खामोखां भारी बना कर बोले की भाइयों और बहनों  तभी पास वैठे एक सदस्य ने  बताया की आज बहने कोई नहीं आई इसलिए सचिव को  रटी हुई भाषा नहीं बोलनी चाहिये। एक एक शब्द का समीचीन प्रयोग होना चाहिए क्यूंकि शब्द ब्रम्ह है और जगत मित्थ्या है। इस पर दूसरे सदस्य ने खड़े होकर अध्यक्ष से पूछा की क्या आज कि  मीटिंग शब्द या ब्रम्ह पर विचार के लिए बुलाई  गए है । अध्यक्ष ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेर कर नकारात्मक सर हिलाया तो दूसरा सदस्य पूरे हाल पर उपहासात्मक नजर डाल  कर बैठ गया । सचिव ने फिर खखारा तो एक सदस्य फुसफुसाया की क्या हालत बना रखी  है?  कुछ लेते क्यों नहीं ? उसके पास के सदस्य ने उसका ज्ञानवर्धन किया कि  यह हालत अपने आप नहीं हो गयी बल्कि इन पर जब से  झाड़ू फिर गयी है तब से यह इस  दशा को प्राप्त हो गए  हैं । सचिव  उस सदस्य की ओर माफ़ कर दिया की दृष्टि डालते हुए खखारने को हुए लेकिन अपनी इस इच्छा को भुनभुनाते हुए भरसक दवाया तो उनके मुंह से आह निकल गयी । अध्यक्ष को यह अच्छा नहीं लगा । उन्होंने सचिव की और आखें तरेरीं तो सचिव ने लम्बा भाषण दिया जिसका लब्बोलुआब यह था कि  आज की बैठक में हार के कारणों पर मंथन किया जाएगा । एक ढीठ सदस्य उठकर बोला की इसमें मंथन की क्या बात है ? चूँकि विरोधी जीत गया इसलिए हम हार गये। दूसरे सदस्य ने बताया की दरअसल हम हारे नहीं बल्कि विरोधी जीत गया । एक ने बताया की हम जीत नहीं पाये इसलिए हार गये। एक और  सदस्य बोला की हमें कम वोट मिले इसलिए हम हार गये। एक ने बताया की चूँकि हमारे मंत्री ने लोगों  को चार से चौदह बच्चे पैदा करने का फरमान दिया था तो लोग उस पर अमल करने के लिए चले गए इसलिए हम हार गये। एक अन्य पार्टीजन बोला कि हमारे एक नेता ने कहा था  कि  मंदिर बनना जरूरी है ।  लोग मंदिर बनाने चले गए इसलिए हम हार गए । अब या तो बच्चे पैदा करा लो या मंदिर बनवा लो या जीत लो ।
                                                       एक ने जब हार का  कारण आयातित प्रत्याशी का होना बताया तो सभी पार्टीजन खड़े हो कर एक साथ बोलने लगे फिर अनुशासनवादी पार्टी दुशासनवादी पार्टी  में बदल औरहर एक ,
हर एक  का चीर खीचने लगा । हालात लाठीचार्ज नुमा होते देख कर अध्यक्ष ने हस्तक्षेप किया तो पार्टीजन बैठ तो गए लेकिन भुनभुते फिर भी रहे। सचिव एक बार फिर खड़े हुए और तीजन बाई स्टाइल में हाथ नचाते हुए बोले की चलो अब यह तय करें कि इस हार के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार कौन है।   इतना सुनते ही सदस्य एक दूसरे की और उंगली उठा कर फिर एक साथ बोलने लगे । जब अध्यक्ष या सचिव ने इस पर कोई नोटिस नहीं लिया तो खुद ही थक कर चुप होगये। खाकी हाफ नेकर पहने एक सदस्य सहसा उछल कर खड़ा हो गया और बोला की हार के लिए वह व्यक्ति जिम्मेदार है जो जीत के लिए जिम्मेदार होता । उसके पीछे बैठे  सदस्य ने उसका विरोध किया तो दायें वाले  ने उसका समर्थन किया । आगे वाले  ने उस समर्थन का विरोध किया । उसके दायें और बांयें वालो ने विरोध का विरोध किया ।  फिर  कुछ समर्थन  और कुछ समर्थन का विरोध करने लगे । फिर  सभास्थल पर हल्दी घाटी से भी अधिक दुर्धर्ष दृश्य उपस्थित होगया । इसे देख कर सचिव और अध्यक्ष भाग कर पिछले दरवाजे से निकल गए । दस मिनट बाद वहां अस्पताल की गाड़ी आते देखी । अगले दिन अखबारों में अध्यक्ष का व्यान छपा कि पार्टी कि हार का मुख्य कारण  जीत न पाना है । यदि हम जीत जाते तो हारते नहीं और इसके लिए सबसे अधिक जीतने वाला जिम्मेदार है।

                                                                                                             136 ,दिलवरगंज
                                                                                                              शाहजहाँपुर ---242001
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