सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

व्यंग्य        

                                                      मांझी जब नाव डुबोये तो---------
                                                                                                                   सुशील "विचित्र "
                                                       
                                                             इसे कहते हैं कि  घर का न घाट  का । बेचारे नितीश । जिसे मांझी  समझ कर नाव सौपी थी अब वह नाव पर से उतर तो नहीं ही रहा है , जबरदस्ती करने पर  उसे डुबोने की धमकी दे रहा है। अब बेचारे  नितीश की समझ में ही नहीं आ  रहा है कि  वे घर पर रहें की घाट  पर ही  टिके  रहें । घर पर रहते हैं तो लालू घात लगाये  वैठे हैं और घाट पर रहते हैं तो सिवाय नाव और उस पर पतवार बगलिया कर  शान से  वैठे मांझी  को देखने के अलावा और क्या करें ? सोंचा तो यह था कि  मांझी को नाव दे कर पतवार अपने हाथ  में रखेंगे लेकिन मांझी भी मजा हुआ मांझी निकला । उसने बड़ी सफाई से पूरी  नाव को कब्जिया लिया । नई पतवारें निकालीं  उन्हें मझधार में पटक कर खुद नाव भगा ले जाने की फिराक में लग गया । धमकी के पत्थर फेंकते हैं तो मांझी नाव तोड़ डालने की धमकी जैसा उनके पत्थर से बड़ा पत्थर फेंकने  लगता है। अब नितीश भी इस सत्य  को जानते हैं कि मांझी जब नाव डुबोये उसे कौन बचाये इसलिए त्रिशंकु की तरह बीच में फंस गये। कहाँ प्रधानमंत्री का ख़्वाब देखा था और कहाँ मंत्री भी नहीं रह गये। न खुदा  ही मिला न विसाले सनम ।मोदी पहले ही पार्टी की वाट लगा गया और अब यह  मांझी नाव पर से उतर  नहीं रहा है । उन्हें नाव पर चढ़ने भी नहीं दे रहा है। सोंचते हैं की कैसी नासमझी की उन्होंने नें । लालू जब जेल यात्रा पर गए तो अपना राजपाठ  अपनी पत्नी को सौप गए । मुझे भी ऐसा ही कुछ करना चाहिए था । राजनीति के समुद्र में  कोई किसी का मांझी नहीं होता । अपनी नाव खुद खेनी  पड़ती है लेकिन उनकी नाव तो मांझी के कब्जे में है । वे समुद्र के बीच में खड़े हैं । मांझी पल प्रतिपल नाव उनसे दूर लिए जा रहा है । अब स्थिति यह है कि  इनके साजन (मुख्यमंत्री की कुर्सी ) है उस पार । यह मझधार । मांझी गया है भाग तो किससे कहें की ले चल  पार ।
                                                       अब  उम्र भी तो ऐसी नहीं रह गयी है की दूसरी नाव बना लें । किसी दूसरे की नाव में चढ़न भी एक विकल्प है लेकिन कोई अपनी नाव में क्यों चढाने लगा ? और मांझी है कि कभी ललकारने लगता है और कभी मजाक उड़ाने लगता है। क्या करें? कहाँ जाएँ? हालांकि देश के प्रथम नागरिक से अपना दुखड़ा  रोने का इरादा है । जल्दी ही वे उनके द्वार पर गुहार लगाएंगे ।  इससे क्या होगा उन्हें खुद ही नहीं मालूम और जब गुहार लगाएंगे तब लगाएंगे अभी तो वे पैदल हैं और मांझी नाव दूर लिए जा रहा है । हालांकि उन्होंने अपनी सवारियां नाव से उतार ली लेकिन कुछ अपनी सवारियां  होते हुए भी मांझी के साथ नाव में वैठी हैं और उन्हें मुंह चिढ़ा  रहीं है। जो सवारियां उतर  कर उनके साथ खड़ी तो हैं वे  ललचाई निगाह से नाव और मांझी की ओर देख रहीं हैं । उन्होंने मांझी  को चुनौती दी है की वह पार जा कर दिखाए । वे इस चुनौती को बम समझ रहे थे लेकिन मांझी की वेफिक्री ने उसे सीला  हुआ पटाखा बना दिया।   अब जल्दी ही उन्होंने मांझी को  नाव से नहीं उतारा या अपनी सवारियों के लिए किसी दूसरी  नाव की जुगाड़ नहीं की तो यह सवारियां भी उनको  गहरे  समुद्र में फेंक कर और खुद  तैर कर मांझी की नाव पर चढ़ सकती हैं या उन्हें डुबो कर पूरी नाव ही मांझी के नाम के सकती हैं । इसलिए यह जरूरी ही गया है की नाव उनके कब्जे में आये। लेकिन ऐसा हो कैसे ? यदि यक्ष  ने ऐसी पोजीशन में युधिष्ठर से  पूंछा होता की नाव पर कब्ज़ा करने की क्या जुगत संभव है तो निश्चय जानिये की धर्मराज भी भाग खड़े होते लेकिन वे तो भाग भी नहीं सकते क्यूंकि भागने  का मतलब है बेरोजगार हो जाना और यही वह अफोर्ड नहीं कर सकते क्यूंकि वे तो मोदी की तरह चाय भी नहीं बना पाते जो यही काम पकड़ कर सुनहरे  दिनों की याद में दिन काट लेते। एक जमाने में वे मोदी का इसीलिये मजाक बनाते थे आज खुद मजाक बने चौराहे पर खड़े हैं और यार यार न रहा  वाले गीत को आसुओं का अर्ध्य दे कर गुनगुना रहे हैं
 
                                                                                                                      शाहजहाँपुर -242001
                                                                                                                    136 , दिलावरगंज
                                                                                                                      मोबा. 9559706019  

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