व्यंग्य
फागुन की तलाश मेंकविताओं में फागुन आया, फागुन आया का शोर सुनते सुनते जब ऊब गया तो मैं एक दिन छुट्टी लेकर फागुन की तलाश में लग गया । सब से पहले मैंने उसे अपने घर में ढूंढा । कोना खुदरा तलाश डाला । सब कुछ पहले जैसा था । पप्पू था, मुन्नी थी , सुनती हो जी थीं , शेरू कुत्ता था ,साईकिल थी लेकिन फागुन कहीं नहीं था । मैंने पत्नी से पूछा कि क्या फागुन आ गया है ? उसने मेरी ओर बिना देखे ही कहा कि अभी तो कोई नहीं आया । तभी हाकर अखबार ले आया | मैंने हाकर से पूछा कि क्या फागुन आया है ? उसने कहा कि इस नाम का तो कोई अखबार नहीं आता बाबू जी । मैंने एक बच्चे से पूछा कि क्या फागुन आया है? उसने बताया कि पता नहीं अंकल लेकिन मेरी परीक्षाएं जरूर आ गयी हैं | एक टैम्पो वाले से पूछा कि क्या फागुन आया है ? उसने कहा कि अभी तो चाँदनी चौक आया है लेकिन यह फागुन पड़ता कहाँ पर है ? क्या कोई नई कालोनी है ?अपने मित्र से पूछा तो उसने कहा कि फागुन का पता नहीं लेकिन उसकी पत्नी मायके से आ गयी है । एक पनवाड़ी से पूछा तो वह पलट कर मुझसे ही पूछने लगा कि बाबू जी यह किसी गुटखे का नाम है या किसी नई तम्बाकू का ? कबीर बाबा ने बताया था की जिन ढूंढा तिन पाइयाँ तो मैं भी ढूंढने में लगा रहा । एक ग्रामीण से पूछा कि क्या फागुन आ गया है ? उसने बताया झम्मन का लड़का फागुन शहर गया है । इसलिए कभी कभी आता है । मैंने पूछा की उसके आने से क्या गाँव में मस्ती आ जाती है ? उसने कहा कि मस्ती तो नहीं आती लेकिन पुलिस जरूर आती है और चोरी या सट्टे के मामले में फागुन को लेजाती है। एक किसान से पूछा । उसने बताया कि पहले का मालूम नहीं लेकिन अबतो लेखपाल आता हैं । कुर्की का आदेश आता है । आँख दिखाता अफसर आता है । एक नायक से पूछा तो उसने कहा कि वह बेलेन्टाइन को जानता है किसी आफ डेट फागुन आगुन को नहीं जनता । एक युवती से पूछा तो वह बोली कि उसके प्रेमी का इतना ओल्ड नेम कैसे हो सकता है । मेरी तलाश अभी भी जारी है । किन्हीं सज्जन को फागुन का पता मिले तो उसे मेरा या मुझे उसका पता देने का कष्ट नुमा कृपा करें |
सुशील "विचित्र"
१३६ दिलावरगंज ,
शाहजहाँपुर -२४२००१
मोबा---९५५९७०६०१९
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