शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं 
और नदियों के किनारे घर बने हैं 
आप के कालीन  देखेंगे किसी दिन 
आज अपने पाँव कीचड़ में सने हैं 
                               दुष्यंत कुमार 


कहीं पर धूप की चादर बिछा के बैठ गए 
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए 
दूकानदार मेल में लुट गए यारों
तमाशवीन दूकानें लगा के वैठ गए 
                            दुश्यंत  कुमार 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें