बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं
और नदियों के किनारे घर बने हैं
आप के कालीन देखेंगे किसी दिन
आज अपने पाँव कीचड़ में सने हैं
दुष्यंत कुमार
कहीं पर धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए
दूकानदार मेल में लुट गए यारों
तमाशवीन दूकानें लगा के वैठ गए
दुश्यंत कुमार
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