सुशील विचित्र के दो छंद
जन्मभूमि उत्तम है, स्वर्ग से भी बढ़ कर है
इस का नहीं कोई प्रतिकार मेरे दोस्तों
देश से बड़ा कोई धर्म नहीं होता है
मैं तो यही जानता हूँ सार मेरे दोस्तों
देश पर ना आंच आये उन्नति सोपान चढ़े
दूध घी की फिर से बहे धार मेरे दोस्तों
फिरभी कभी देश को जरूरत पड़े सबसे पहले
मेरा सिर लेना उतार मेरे दोस्तों
अब न बढ़ें खाइयाँ, जो बन चुकीं हमारे बीच
जितना हो जल्दी इन्हें पाट देना चाहिए
इस पवित्र कार्य मैं जो रोड़ा लगाये उसके
हाथ पैर तोड़ डाल खाट देना चाहिए
कायर जब वीरता का करने लगे प्रलाप
बंद कर कानों के कपाट लेना चाहिए
देश के खिलाफ करे विष वमन मुख उसे
छः इंच ऊपर से छाँट देना चाहिये
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